N0. One Patrika uttranchal deep
8881788066
मोदी का दम
धारा 370 बेदम
उत्तराखंड के अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव की टीम ने जम्मू-कश्मीर मिशन फतह करने के लिए राज्यसभा में जुटाया जादुई आकंड़ा।
‘जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और केेंद्र शासित राज्य का दर्जा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपने विश्वासपात्रों की टीम बनाई, इसमें न केवल कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद, एनएसए अजित डोभाल, उत्तराखंड के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव को शामिल किया गया बल्कि आईएएस अफसरों के साथ कानून के जानकारों को टीम का हिस्सा बनाया गया था। गृह मंत्री ने प्रमुख पत्रकारों के साथ बैठक कर वचन ले लिया था कि वे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की गोपनियता को तब तक भंग न करें जब तक कि इसे सदन के पटल पर न रख दिया जाए।’
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य के टुकड़े करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन की शुरुआत तो जून के तीसरे हफ्ते में ही हो गई थी, जब उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के आईएएस बीवीआर सुब्रमण्यम को जम्मू-कश्मीर का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया था। सुब्रमण्यम पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) में संयुक्त सचिव के रूप में पहले भी प्रधानमंत्री के साथ काम कर चुके हैं। वह मोदी के मिशन कश्मीर के मुख्य अधिकारियों में से रहे। मिशन कश्मीर का सारा काम केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को दिया गया था, जो कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद के साथ मिलकर अपनी कोर टीम के साथ कानून निहितार्थ की समीक्षा कर रहे थे, जिसमें कानून और न्याय सचिव आलोक श्रीवास्तव, अतिरिक्त सचिव कानून (गृह मंत्रालय) आरएस वर्मा, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा और कश्मीर खंड की उनकी चुनी हुई टीम शामिल थी।
शाह ने बजट सत्र की शुरुआत से पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत और उनके सहयोगी (महासचिव) भैयाजी जोशी को अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को दो अलग केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार की योजना से अवगत करा दिया था। कानूनी सलाह-मशविरे के बाद शाह का ध्यान अनुच्छेद 370 हटाने और इसकी घाटी में प्रतिक्रिया के साथ कानून-व्यवस्था को संभालने पर था। शाह से जुड़े एक सूत्र का कहना है कि प्रधानमंत्री की सलाह पर शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल के साथ कई दौर की बैठक की।
डोभाल ने श्रीनगर में मोर्चा संभाला
गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कश्मीर के हालात की समीक्षा करने के बाद डोभाल को सुरक्षा की दृष्टि से स्थिति की समीक्षा करने के लिए श्रीनगर भेजा था। एनएसए ने वहां तीन दिन तक डेरा डाला। डोभाल के दिल्ली लौटने पर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की 100 कंपनी भेजने का फैसला हुआ और 26 जुलाई को अमरनाथ यात्रा रोकने का निर्णय हुआ। घाटी से सभी पर्यटकों के साथ बाहरी लोगों को निकालने की सलाह डोभाल ने ही दी।
सुब्रमण्यम ने बनाई योजना
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव सुब्रमण्यम लगातार, प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के संपर्क में रहे, उन्होंने ग्राउंड जीरो पर कई सुरक्षा कदम उठाने का खाका तैयार किया, जिसमें पुलिस, अद्र्धसैनिक बलों और प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों द्वारा सैटेलाइट फोन का प्रयोग करने, संवेदनशील शहरी और ग्रामीण इलाकों में क्यूआरटी (क्विक रेस्पांस टीम) को तैनात कराया। साथ ही सेना को नियंत्रण रेखा पर चौकसी बढ़ाने के निर्देश दिए। सेना, सुरक्षा एजेंसियों और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के प्रमुख केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य के मुख्य सचिव के साथ चौबीसों घंटे संपर्क में थे।
जम्मू-कश्मीर में धारा 144
चार अगस्त की महत्वपूर्ण रात मुख्य सचिव ने पुलिस महानिदेशक (जम्मू एवं कश्मीर) दिलबाग सिंह को कई निवारक कदम उठाने के निर्देश दिए, जिनमें प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी, मोबाइल और लैंडलाइन सेवाएं बंद करने, धारा 144 लागू करने तथा घाटी में कफ्र्यू के दौरान सुरक्षा बलों की गश्त बढ़ाना शामिल था।
सांसद अनिल बलूनी व भूपेंद्र यादव का रोल
मिशन जम्मू-कश्मीर फतह करने के में उत्तराखंड के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव का योगदान भी कम नहींरहा है। क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने इन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाकर उच्च सदन (राज्यसभा) में सदस्यों का समर्थन जुटाने का काम सौंपा गया था। राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं है। राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव ने टीडीपी के राज्यसभा सदस्यों को तोड़ा और समाजवादी पार्टी के सांसद नीरज शेखर, सुरेंद्र नागर, संजय सेठ और कांग्रेस सांसद सजय सिंह को राज्यसभा से इस्तीफा दिलवाने का प्रबंध किया। इसके बाद भाजपा को उच्च सदन में काफी बल मिला। सबसे आखिर में टीम बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के नेता सतीश मिश्रा का समर्थन हासिल करने में कामयाबी पाई।
पत्रकारों को हिदायत
गृहमंत्री अमित शाह ने प्रमुख पत्रकारों (जिनकी गृह मंत्रालय तक पहुंच थी) के साथ भी बंद कमरे में बैठक की और अति संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित रिपोर्टिग करने की हिदायत दी। शाह का मुख्य जोर शीर्ष स्तर की गोपनियता बरकरार रखने पर थी, जब तक कि वे पांच अगस्त को इस विधेयक को राज्यसभा के पटल पर पेश नहीं करते। दो अगस्त को शाह को भरोसा हो गया कि उनकी पार्टी को राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन हासिल हो गया है और सोमवार को उच्च सदन में इस ऐतिहासिक विधेयक (जम्मू-कश्मीर के टुकड़े करने) को पेश किया गया। इस दौरान भाजपा सांसदों को व्हिप जारी किया गया था कि वे संसद में उपस्थित रहें, जहां महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए जाने हैं।
राष्ट्रपति को भी भरोसे में लिया
नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सोमवार को मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने और मंत्रियों को मिशन कश्मीर की जानकारी देने का फैसला किया। सदन से पहले इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसी तरह, कानून और न्याय मंत्रालय को अनुच्छेद 370 निरस्त करने की अधिसूचना राष्ट्रपति से जल्द जारी करवाने का काम सौंपा गया। राज्यसभा में शोर-शराबे के बीच सोमवार को अमित शाह ने जब विधेयक पेश किया, तो भाजपा के एक सांसद ने प्रतिक्रिया की कि शाह का मिशन कभी नाकामयाब नहीं होता।
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मोदी का दम
धारा 370 बेदम
उत्तराखंड के अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव की टीम ने जम्मू-कश्मीर मिशन फतह करने के लिए राज्यसभा में जुटाया जादुई आकंड़ा।
‘जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और केेंद्र शासित राज्य का दर्जा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपने विश्वासपात्रों की टीम बनाई, इसमें न केवल कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद, एनएसए अजित डोभाल, उत्तराखंड के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव को शामिल किया गया बल्कि आईएएस अफसरों के साथ कानून के जानकारों को टीम का हिस्सा बनाया गया था। गृह मंत्री ने प्रमुख पत्रकारों के साथ बैठक कर वचन ले लिया था कि वे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की गोपनियता को तब तक भंग न करें जब तक कि इसे सदन के पटल पर न रख दिया जाए।’
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य के टुकड़े करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन की शुरुआत तो जून के तीसरे हफ्ते में ही हो गई थी, जब उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के आईएएस बीवीआर सुब्रमण्यम को जम्मू-कश्मीर का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया था। सुब्रमण्यम पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) में संयुक्त सचिव के रूप में पहले भी प्रधानमंत्री के साथ काम कर चुके हैं। वह मोदी के मिशन कश्मीर के मुख्य अधिकारियों में से रहे। मिशन कश्मीर का सारा काम केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को दिया गया था, जो कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद के साथ मिलकर अपनी कोर टीम के साथ कानून निहितार्थ की समीक्षा कर रहे थे, जिसमें कानून और न्याय सचिव आलोक श्रीवास्तव, अतिरिक्त सचिव कानून (गृह मंत्रालय) आरएस वर्मा, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा और कश्मीर खंड की उनकी चुनी हुई टीम शामिल थी।
शाह ने बजट सत्र की शुरुआत से पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत और उनके सहयोगी (महासचिव) भैयाजी जोशी को अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को दो अलग केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार की योजना से अवगत करा दिया था। कानूनी सलाह-मशविरे के बाद शाह का ध्यान अनुच्छेद 370 हटाने और इसकी घाटी में प्रतिक्रिया के साथ कानून-व्यवस्था को संभालने पर था। शाह से जुड़े एक सूत्र का कहना है कि प्रधानमंत्री की सलाह पर शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल के साथ कई दौर की बैठक की।
डोभाल ने श्रीनगर में मोर्चा संभाला
गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कश्मीर के हालात की समीक्षा करने के बाद डोभाल को सुरक्षा की दृष्टि से स्थिति की समीक्षा करने के लिए श्रीनगर भेजा था। एनएसए ने वहां तीन दिन तक डेरा डाला। डोभाल के दिल्ली लौटने पर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की 100 कंपनी भेजने का फैसला हुआ और 26 जुलाई को अमरनाथ यात्रा रोकने का निर्णय हुआ। घाटी से सभी पर्यटकों के साथ बाहरी लोगों को निकालने की सलाह डोभाल ने ही दी।
सुब्रमण्यम ने बनाई योजना
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव सुब्रमण्यम लगातार, प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय के संपर्क में रहे, उन्होंने ग्राउंड जीरो पर कई सुरक्षा कदम उठाने का खाका तैयार किया, जिसमें पुलिस, अद्र्धसैनिक बलों और प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों द्वारा सैटेलाइट फोन का प्रयोग करने, संवेदनशील शहरी और ग्रामीण इलाकों में क्यूआरटी (क्विक रेस्पांस टीम) को तैनात कराया। साथ ही सेना को नियंत्रण रेखा पर चौकसी बढ़ाने के निर्देश दिए। सेना, सुरक्षा एजेंसियों और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के प्रमुख केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य के मुख्य सचिव के साथ चौबीसों घंटे संपर्क में थे।
जम्मू-कश्मीर में धारा 144
चार अगस्त की महत्वपूर्ण रात मुख्य सचिव ने पुलिस महानिदेशक (जम्मू एवं कश्मीर) दिलबाग सिंह को कई निवारक कदम उठाने के निर्देश दिए, जिनमें प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी, मोबाइल और लैंडलाइन सेवाएं बंद करने, धारा 144 लागू करने तथा घाटी में कफ्र्यू के दौरान सुरक्षा बलों की गश्त बढ़ाना शामिल था।
सांसद अनिल बलूनी व भूपेंद्र यादव का रोल
मिशन जम्मू-कश्मीर फतह करने के में उत्तराखंड के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव का योगदान भी कम नहींरहा है। क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने इन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाकर उच्च सदन (राज्यसभा) में सदस्यों का समर्थन जुटाने का काम सौंपा गया था। राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं है। राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और भूपेंद्र यादव ने टीडीपी के राज्यसभा सदस्यों को तोड़ा और समाजवादी पार्टी के सांसद नीरज शेखर, सुरेंद्र नागर, संजय सेठ और कांग्रेस सांसद सजय सिंह को राज्यसभा से इस्तीफा दिलवाने का प्रबंध किया। इसके बाद भाजपा को उच्च सदन में काफी बल मिला। सबसे आखिर में टीम बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के नेता सतीश मिश्रा का समर्थन हासिल करने में कामयाबी पाई।
पत्रकारों को हिदायत
गृहमंत्री अमित शाह ने प्रमुख पत्रकारों (जिनकी गृह मंत्रालय तक पहुंच थी) के साथ भी बंद कमरे में बैठक की और अति संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित रिपोर्टिग करने की हिदायत दी। शाह का मुख्य जोर शीर्ष स्तर की गोपनियता बरकरार रखने पर थी, जब तक कि वे पांच अगस्त को इस विधेयक को राज्यसभा के पटल पर पेश नहीं करते। दो अगस्त को शाह को भरोसा हो गया कि उनकी पार्टी को राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन हासिल हो गया है और सोमवार को उच्च सदन में इस ऐतिहासिक विधेयक (जम्मू-कश्मीर के टुकड़े करने) को पेश किया गया। इस दौरान भाजपा सांसदों को व्हिप जारी किया गया था कि वे संसद में उपस्थित रहें, जहां महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए जाने हैं।
राष्ट्रपति को भी भरोसे में लिया
नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सोमवार को मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने और मंत्रियों को मिशन कश्मीर की जानकारी देने का फैसला किया। सदन से पहले इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसी तरह, कानून और न्याय मंत्रालय को अनुच्छेद 370 निरस्त करने की अधिसूचना राष्ट्रपति से जल्द जारी करवाने का काम सौंपा गया। राज्यसभा में शोर-शराबे के बीच सोमवार को अमित शाह ने जब विधेयक पेश किया, तो भाजपा के एक सांसद ने प्रतिक्रिया की कि शाह का मिशन कभी नाकामयाब नहीं होता।

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